कि छंद के द्वंद्व के अपने मजे हैं
ललकार के महाकाय आकर से सजे हुए हैं
न तीर , न भाले , न गोले बरसायेंगे
फिर भी छंदों की चोट से तेरा लहू बहाएंगे
हैं जीतने का साहस तो सर उठा और लिख
या हार मान ले और ले दया की भीख
तेरी वार के चोटों से उभर के आऊंगा
और फिर छंद के द्वंद्व से तुझे हराऊंगा
---दीपक
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