लेन देन

लेन देन बहुत ही सहज दो सब्द हैं | पर जो इनके सही मतलब समझ ले उसे जीवन में शायद ही दुख हो |
जब हम केवल लेने के उद्देश्य से काम करते हैं हम याचक होते हैं पर जब हम किसी को कूच देते हैं या दान करते हैं हम यजमान होजाते हैं | और ईश्वर केवल याचना करने वालों की नहीं सुनता बल्कि यजमान की सुनता हैं जो यज्ञ कराता हैं , दान करता हैं , आहुति देता हैं |
अतः यजमान बनो याचक नहीं | लेन देन समाज की निरंतरता को बनाये रखने में सहायक हैं किन्तु  स्वार्थ साधकता और मैं , मेरा , मुझसे , जैसे स्वयं सुख से मनुष्य कभी सुखी नहीं रह सकता | जब तक निश्वार्थ भाव से कोई काम नहीं करते कर्म के चक्र से मुक्ति नहीं मिलेगी और न मिलेगा सुकून |

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