माँ के संग गोठ
बस घरे के करीबी मन जाथे बरात और लड़की डाहर घलो बस आठे दस झन आठे मस्त सस्ता में निपट जथे|में फेर कैथे हमरो घर अइसने निपट जाथिस तेने बने रैतीस|अच्छा , में केहेव फिकर झन कर दू साल तक अइसने रइही ये सब सादी बिहाव छट्टी, बरही , मरनी-हरनी ह |भले काम काज चालू होजाही लेकिन अइसना काम ह नै होने वाला कम से कम दू साल तक |इहि बने हे |
कोरोना को लेकर लोग निश्चित ही चिंतित हैं और काफी आर्थिक नुक्सान हो रहा लघु तथा बड़ी कमापनियों को, तथा शैक्षणिक संस्थानों को भी किन्तु बहुत अच्छे प्रभाव भी महसूस हो रहा है |जिसमे एक बड़ा ही स्वाभाविक और जटिल मुद्दा है शादी और पार्टियों में होने वाले खर्चा जो हमारी सामाजिक समस्या है | छत्तीसगढ़ में अभी बहुत ज्यादा शादियां सुनी मैंने |वैसे तो छत्तीसगढ़ में आम तौर पे ( माधयम सहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में ) बहुत कम ही शादी होजाता है औसतन ४-५ लाख किन्तु अभी कोरोना काल में इससे कहीं कम में निपट जा रहा है |छत्तिसगरी शादियों में खर्चा खाना पीना , मेहमानो को कपडा भेट करने में , बरात स्वागत , और थोड़ा में दहेज़ में ही होता है |किन्तु कोरोना के कारण ज्यादा लोग नै आ रहे तथा बरात में भी बाहत कम लोग ही जा रहे जहाँ १००-१५० जथे थे अभी १०-१५ जा रहे सोचिये कितना फिजूल खर्ची बच रहाहै |उसी प्रकार घर में करीब ५०-६० लोग ५ दिनों तक रहते है जो अब मुहकिल से १०-२० हैं वो भी २-३ दिनों के लिए ही , २-३ लाख खर्चा यहीं बच जा रहा है |जिस कुप्रथा को इकोनॉमिक्स में एक मुख्या कारण माना जाता है गरीबी का उसपे काफी अच्छा प्रभाव पड़ा है, उमीद्द रहेगी कि आगे भी इनसब चीचों के फायदे को समाज के लोग इस प्रकार कि शादगी पूर्ण जीवन का पालन करें |


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